दिवाली

A festival night far from home — light outside, homesickness within, and childhood calling back.

दिवाली त्यौहार नहीं एक एहसास है
घरवालों के चेहरों पे ख़ुशी का आभास है
पटाखों का शोर और पूजा का वास है
इसका सरल होना ही सबसे ख़ास है |

वो अक्टूबर का महीना, काम कम छुट्टियां ज़्यादा
मेरे जन्मदिन का महीना, किस्से दिवाली के है ज़्यादा
उम्र के साथ त्यौहार के मायने भी बदलते है
पहले पटाखे खूब थे, अब रंगोलियां है ज़्यादा |

बस काट रहा हूँ किसी तरह ये शाम
मन में कुछ यादें लिए और हाथों में एक कप जाम
वो zoom पे की हुई आरती, कुछ पीड़ा कम तो करती है
घर की वह छोटी सी ज़मीन, मानो सोने सी लगती है |

वह माँ के हाथ में घंटी देखकर, गुस्सा बहुत आता है
क्यों इस बार उसका बेटा, घंटी छीन नहीं पाता है
वह झालर भी तो इस बार, पापा ने ही टांगी है
न बेटे से मदद, न बेटी की राय मांगी है |

दिवाली का खाना, बस अब बातों में ही आता है
वह कैर सांगरी और मटर पनीर, छोड़ यार! मन बहुत ललचाता है
कांजी खट्टी होते होते, बड़े ख़त्म हो जाते थे
२ सूखे बड़े बनवाकर हम, हर साल नियम से खाते थे |

इन चार दीवारों में कैद, मैं घर को जाना चाहता हूँ
उन सपनों की उड़ान से, मुँह फेर लेना चाहता हूँ
यादें है, प्यार है, परिवार है, सुकून है, क्या है वहाँ?
दिवाली तो एक बहाना है, मैं बस अपना बचपन वापस चाहता हूँ |

बड़ा हूँ, समझदार हूँ, खुद को समझा लिया
मुँह फेर कर मन कहीं दूर लगा दिया
फिर किसी दिन जब याद घर की आएगी
चुप किसी कोने में आँख मेरी भर जाएगी
सोचना यह तो बस मंज़िल की राह में एक मोड़ है
तुम हो नायक इस कहानी के, तुम से ही इसका तोड़ है ||

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