मुस्कुरा दोगी क्या?

A day stitched with small gestures — love spoken softly through routine.

मैं सुबह उठकर तुम्हे देखूंगा
इशारों में पास बुला लोगी क्या?
मैं घूमकर तुम्हारा माथा चूमूंगा
शर्माकर थोड़ा मुस्कुरा दोगी क्या?

मैं नहाकर आऊंगा तो
नाश्ते में फूली रोटी बना दोगी क्या?
मैं किचन में पीछे से लिपट जाऊँ तो
घूमकर गले लगा लोगी क्या?

जब दोपहर में ऑफिस से कॉल करूँ तो
हाल अपना बता दोगी क्या?
याद अगर तुम्हारी बहुत आये तो
दूर से ही प्यार जता दोगी क्या?

मैं शाम को जब घर आऊंगा
चाय तुम बना दोगी क्या?
अपने दिन की सारी बातें मुझे
बिन पूछे ही बता दोगी क्या?

मैं सर तुम्हारा दबा दूंगा
हाथ मेरे सेहला दोगी क्या?
खाना खाने का मन न करे तो
अपने हाथों से खिला दोगी क्या?

मैं बर्तन सारे धो दूंगा
तुम बिस्तर मेरा लगा दोगी क्या?
जब थक कर मैं सो जाऊँ तो
धीरे से बत्तियां बुझा दोगी क्या?

मैं बीच रात अगर जग जाऊँ तो
फूख मार कर सुला दोगी क्या?
अगले दिन जब फिर से देखूं तुम्हे
इशारों में फिर से पास बुला लोगी क्या?
मैं घूमकर तुम्हारा माथा चूमूंगा
शर्माकर थोड़ा मुस्कुरा दोगी क्या?

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