सपने
At the threshold of college — too many futures, one self, and the stubborn hope to choose.
आज सोचता हूँ कुछ ऐसा लिखूं,
प्यार और मोहब्बत को एक तरफ़ा करून,
कुछ सपने जो मैंने सोच रखे थे खुद ke लिए,
कलम उठाऊं और उनको बेपर्दा करून |
न जाने यह सफर कुछ अनजाना सा लगता है
कभी बहुत अपना, कभी बहुत बेगाना सा लगता है
हर बार इसका नायक मैं ही तो होता हूँ
फिर भी, न जाने क्यों इतना लुभावना सा लगता है |
जब इस तरफ देखा, तो साइंस/मैथ्स की लगी होड़ थी
जब उस तरफ देखा, तो कॉमर्स/आर्ट्स भी बहुत बेजोड़ थी,
जब ठहर कर खुद में झाखा, तो देखा,
इन सब के बीच ही, फसी मेरी मंज़िल की मोड़ थी |
IIT/NIT मानो, लगता अब एक धोका है,
अवसरों से भरे भवन में, छोटा सा एक झरोखा है
नींद इन दिनों अक्सर मेरी, कच्ची सी रह जाती है,
इन सपनो के आगे कोशिश, बच्ची सी रह जाती है,
सोचता हूँ इन सपनों से वफाई कर लून
इनसे की हुई बेवफाई अक्सर, सच्ची सी रह जाती है |
सुबह सुबह उठकर चाहता हूँ, कलक्ट्री वाला बाबू बनना,
चार नौकर आगे पीछे, तीन मंज़िली घर हो अपना
दो पेहरी होते होते, जब प्रोफेसर पाठ पढ़ाता है,
सिलिकॉन वैली का वो सपना, बहुत बहुत लुभाता है |
जब शाम का मौसम आता है, मन खेलने को ललचाता है,
कोहली, तेंदुलकर को देख, पैशन क्रिकेट बन जाता है
फिर शाम को ढलता देख-देखकर, चाँद निकलकर आता है,
और उसके अन्धकार से डरकर, मन बचपन वापस चाहता है |
फिर तन्हाई में डूब-डूबकर, हम मय का सेवन करते हैं,
हाथों में कलम उठाकर, शायर खुद को समझते हैं
जब ख्वाब की बारी आती है, सपनों को छूट मिल जाती है,
सारी सपनों की सीमाएं, बौनी ही रह जाती है |
entrepreneurship का कीड़ा, तब हमको डस जाता है,
अम्बानी, बिरला और टाटा, मन बस यही बनना चाहता है
फिर रात बहुत हो जाने से, आँख मेरी लग जाती है,
और मेरे सपनों की ये गाडी, किसी अनजाने मोड़ पर रुक जाती है |
किन्तु मायूस नहीं हूँ मैं, कल आने को है नया सवेरा,
फिर चलेगी गाडी, देने मेरे सपनों को नया बसेरा
यही न थक कर थम जाऊं, बस एक ही ख्वाइश है मेरी,
उस शोहरत का मैं मोहताज़ नहीं, जो न है तेरी न है मेरी ||
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